Tuesday, March 3, 2026
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सपा के आरोपों पर चुनाव आयोग ने खोला पोल, सपा नकली हलफनामों से उठा विवाद, सपा ने ‘18,000 हलफ़नामों’ का दावा करने के लिए डिजिटल प्रतियों का इस्तेमाल किया

यूपी सीईओ ने बताया कि सपा से उन्हें कोई असली हलफनामा नहीं मिला। केवल 3919 स्कैन कॉपी ईमेल से भेजी गईं।

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25 अगस्त को समाजवादी पार्टी के मीडिया सेल ने एक वीडियो पोस्ट किया। इस वीडियो में उत्तर प्रदेश के मंत्री असीम अरुण दिख रहे थे। उन्होंने कहा कि कन्नौज में वोट चोरी हुई थी। साथ ही उन्होंने चुनाव आयोग पर भरोसा जताया और बताया कि आयोग लगातार समस्या सुलझा रहा है।

अरुण ने खुलासा किया कि कुछ लोगों के नाम वोटर लिस्ट में कई बार दर्ज हुए। आयोग इन गड़बड़ियों को सही कर रहा है। उन्होंने सपा नेताओं पर भी आरोप लगाया कि 2024 लोकसभा चुनाव में कन्नौज में वोट चोरी उन्हीं ने की। कन्नौज सीट से अखिलेश यादव ने बीजेपी उम्मीदवार सुभ्रत पाठक को साढ़े 1.70 लाख वोटों से हराया था।

सपा ने इस वीडियो को पोस्ट कर लिखा-“फिर एसडीएम को सस्पेंड कराइए, सरकार आपकी है, मंत्री भी आप ही हैं।” सपा ने चुनाव आयोग को भी टैग किया। इसके बाद यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) ने तुरंत जवाब दिया। उन्होंने कहा कि मामला नोट किया गया है और कन्नौज जिला निर्वाचन अधिकारी को जांच के निर्देश दिए गए हैं।

सपा के भारी-भरकम आरोप

वीडियो शेयर करने के बाद समाजवादी पार्टी भड़क गई। उसने कहा कि चुनाव आयोग केवल बीजेपी नेताओं की बात सुनता है। विपक्ष की शिकायतों को नजरअंदाज करता है।

सपा ने सवाल किया कि जब बीजेपी के मंत्री गड़बड़ी की ओर इशारा करते हैं तो आयोग तुरंत कार्रवाई करता है, लेकिन विपक्ष की शिकायतों पर ध्यान क्यों नहीं देता।

पार्टी ने और आगे बढ़कर पूछा, “डीएम और एसडीएम, जो बीजेपी के साथ मिलकर चुनावी गड़बड़ी में फंसे हैं, उन्हें कब सस्पेंड किया जाएगा? उन पर देशद्रोह जैसे कानून से कार्रवाई कब होगी?”

यही नहीं, सपा ने आयोग को “धृतराष्ट्र” तक कह डाला। उसने आरोप लगाया कि 2022 के विधानसभा चुनाव और उपचुनाव बीजेपी ने धांधली से जीते। सपा का आरोप है कि आयोग ने इन गलतियों को अनदेखा कर दिया।

18 हजार हलफनामों का विवाद

सपा मीडिया सेल ने फिर दावा किया कि उसने जनता के 18 हजार हलफनामे चुनाव आयोग को दिए हैं, लेकिन आयोग ने कुछ नहीं किया। पार्टी ने कहा कि इन शिकायतकर्ताओं को डराया और धमकाया जा रहा है।

लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट निकली। यूपी सीईओ ने बताया कि सपा से उन्हें कोई असली हलफनामा नहीं मिला। केवल 3919 स्कैन कॉपी ईमेल से भेजी गईं। जांच में पता चला कि इनमें से कई हलफनामे ऐसे लोगों के नाम से बने थे, जिनकी मौत कई साल पहले हो चुकी थी।

जिन लोगों से संपर्क किया गया, उन्होंने साफ कहा कि उन्होंने ऐसा कोई हलफनामा नहीं दिया। सीईओ ने साफ किया कि झूठे दस्तावेज देना अपराध है और यह क़ानून के तहत दंडनीय है।

अखिलेश यादव का “गणित” और आयोग का जवाब

21 अगस्त को अखिलेश यादव ने कहा था, “18 हजार हलफनामों में से सिर्फ 14 पर स्पष्टीकरण मिला है। 17,986 तो अब भी बचे हैं। यही है इंसाफ का गणित।” उन्होंने दावा किया कि उनकी पीडीए सरकार आने पर धांधली नहीं होगी।

सीईओ ने उसी वक्त जवाब दिया। उन्होंने बताया कि उन्हें सपा के ईमेल से सिर्फ 37 शिकायतें मिलीं। इनमें 74 विधानसभा क्षेत्रों के लगभग 3919 हलफनामे थे।

उदाहरण के लिए, चकिया विधानसभा क्षेत्र का मामला देखा गया। वहां चार लोगों के नाम हटाने की शिकायत थी। जांच में पाया गया कि उन चारों का नाम वोटर लिस्ट में सही-सलामत मौजूद है। मज़े की बात यह रही कि जिन चार लोगों के नाम पर हलफनामा दिया गया, उन्होंने खुद कहा कि उन्होंने कोई शिकायत ही नहीं की।

मुख्य चुनाव आयुक्त का बयान

इस विवाद के बीच 17 अगस्त को मुख्य चुनाव आयुक्त ग्यानेश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने कहा कि आयोग को अखिलेश यादव या यूपी से एक भी असली हलफनामा नहीं मिला। यहीं से विवाद भड़का।

जिलाधिकारियों ने भी जांच की और पाया कि जिन नामों को कटने का आरोप था, उनमें से कई लोग मर चुके थे या दूसरी जगह शिफ्ट हो गए थे। कुछ नाम दोहरी प्रविष्टि होने के कारण हटाए गए। यानी सपा का पूरा आरोप बेबुनियाद निकला।

असीम अरुण ने क्या कहा

असीम अरुण ने आरोप लगाया कि कन्नौज की वोटर लिस्ट में भी धांधली हुई। उन्होंने कहा कि आदंगापुर और गावल मैदान बूथ पर सपा से जुड़े नवाब सिंह और उनके भाइयों के नाम कई बार दर्ज हैं।

उन्होंने कहा कि जिला निर्वाचन अधिकारी को जांच करनी चाहिए। नवाब सिंह इस समय एक आपराधिक मामले में जेल में हैं। अरुण ने मांग की कि वोटर लिस्ट की शुद्धि हो और सपा इस धांधली के लिए माफी मांगे।

समाजवादी पार्टी और उसके झूठे आरोप 

यह विवाद केवल आंकड़ों का खेल और झूठे आरोप साबित हुआ। समाजवादी पार्टी लगातार कहती रही कि चुनाव आयोग बीजेपी के इशारे पर काम करता है। लेकिन हर बार जांच में उसके दावे झूठे निकले। न केवल हलफनामे नकली पाए गए, बल्कि जिन लोगों के नाम से शिकायतें दर्ज हुईं, उन्होंने खुद आरोपों को नकार दिया।

लगातार झूठे दस्तावेज और राजनीतिक बयानबाज़ी समाजवादी पार्टी को कठघरे में खड़ा कर रही है। वहीं, चुनाव आयोग ने तथ्यों और जांच रिपोर्टों के साथ बार-बार यह साबित किया कि आरोप आधारहीन हैं।

UP4India Desk
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