सम्पूर्ण हिन्दू समाज का बल सम्पन्न, शील सम्पन्न संगठित स्वरूप ही इस देश की एकता, एकात्मता, विकास व सुरक्षा की गारंटी है। क्योंकि हिन्दू समाज अलगाव की मानसिकता से मुक्त और सर्व समावेशक है। हिन्दू समाज ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की उदार विचारधारा का पुरस्कर्ता व संरक्षक है। इसलिए संघ सम्पूर्ण हिन्दू समाज के संगठन का कार्य कर रहा है, क्योंकि संगठित समाज अपने समस्त कर्तव्यों को स्वयं के बलबूते ही पूरा कर लेता है। यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने रेशिमबाग मैदान में आयोजित विजयादशमी उत्सव में कही। उल्लेखनीय है कि यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना का शताब्दी वर्ष है।
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने बल देकर कहा कि भारतवर्ष को वैभवशाली बनाना और सम्पूर्ण विश्व के लिए अपेक्षित तथा उचित योगदान देना हिन्दू समाज का कर्तव्य है। इस अवसर पर मंच पर भारत के पूर्व राष्ट्रपति मा. रामनाथ कोविंद, संघ के विदर्भ प्रान्त संघचालक मा. दीपक तामशेट्टीवार, विदर्भ प्रान्त सह संघचालक मा. श्रीधर गाडगे और नागपुर महानगर संघचालक मा. राजेश लोया उपस्थित थे।
स्वदेशी तथा स्वावलम्बन का कोई विकल्प नहीं
सरसंघचालक जी ने कहा कि अमेरिका ने अपने स्वयं के हितों को आधार बनाकर जो आयात शुल्क नीति अपनाई है, उसके कारण हमें भी कुछ विषयों पर पुनर्विचार करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि विश्व परस्पर निर्भरता पर आधारित है, किन्तु यह परस्पर निर्भरता हमारी मजबूरी न बने, इसके लिए हमें आत्मनिर्भर बनना होगा। स्वदेशी तथा स्वावलम्बन का कोई विकल्प नहीं है।
डॉ. भागवत ने विश्व की जड़वादी और उपभोगवादी नीतियों के परिणामस्वरूप हो रहे पर्यावरणीय असंतुलन पर चिन्ता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि भारत में भी उसी नीति के चलते वर्षा का अनियमित और अप्रत्याशित स्वरूप, भूस्खलन और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं गत तीन-चार वर्षों में तेजी से बढ़ गई हैं। दक्षिण एशिया का सारा जलस्रोत हिमालय से आता है। उस हिमालय में लगातार घट रही दुर्घटनाओं को भारतवर्ष और दक्षिण एशिया के अन्य देशों के लिए खतरे की घंटी मानना चाहिए।

उपद्रवी शक्तियों से सावधान
डॉ. भागवत ने भारत के पड़ोसी देशों की अराजक स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों से वहाँ बहुत उथल-पुथल मची हुई है। श्रीलंका, बांग्लादेश और हाल ही में नेपाल में जन-आक्रोश का हिंसक उद्रेक होकर सत्ता परिवर्तन हुआ। हमारे देश में और विश्वभर में भारतवर्ष के भीतर भी इस प्रकार के उपद्रव चाहने वाली शक्तियाँ सक्रिय हैं, जो चिंता का विषय है।
उन्होंने कहा कि शासन-प्रशासन का समाज से टूटता हुआ सम्बन्ध और चुस्त व लोकाभिमुख कार्यप्रणाली का अभाव असंतोष के कारण बनते हैं। लेकिन हिंसक उद्रेक वांछित परिवर्तन नहीं ला सकते। आमूलचूल परिवर्तन केवल प्रजातांत्रिक मार्ग से ही संभव है, अन्यथा ऐसे आंदोलनों का लाभ विश्व की वर्चस्ववादी ताकतें उठाने लगती हैं। सरसंघचालक ने कहा कि हमारे पड़ोसी देश सांस्कृतिक दृष्टि से और आपसी संबंधों के कारण भारत से जुड़े हुए हैं। इसलिए वहाँ शांति, स्थिरता, उन्नति और सुख-सुविधा भारत के हित में भी आवश्यक हैं।
वर्तमान आशाएं और चुनौतियाँ
डॉ. भागवत ने कहा कि वर्तमान काल एक ओर हमारे विश्वास और आशा को अधिक बलवान बनाने वाला है और दूसरी ओर पुरानी व नई चुनौतियों को स्पष्ट रूप से उजागर करने वाला है। इसने हमारे लिए कर्तव्य-पथ को भी निर्देशित किया है।
उन्होंने कहा कि गत वर्ष प्रयागराज में सम्पन्न महाकुंभ ने श्रद्धालुओं की संख्या और उत्तम व्यवस्थापन दोनों में नए कीर्तिमान स्थापित करते हुए एक जागतिक विक्रम किया। इसके परिणामस्वरूप पूरे भारत में श्रद्धा और एकता की प्रचण्ड लहर महसूस की गई। वहीं, 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में सीमापार से आए आतंकियों ने 26 भारतीय यात्रियों की उनके हिन्दू धर्म की पहचान पूछकर हत्या की। इसके बाद सम्पूर्ण भारतवर्ष में दुःख और क्रोध की ज्वाला भड़की। भारत सरकार ने योजना बनाकर मई महीने में इसका सशक्त उत्तर दिया। इस अवधि में देश के नेतृत्व की दृढ़ता, सेना का पराक्रम, युद्ध कौशल और समाज की एकता ने एक सुखद दृश्य प्रस्तुत किया।
राष्ट्रीय सुरक्षा और नक्सल समस्या
सरसंघचालक ने कहा कि अन्य देशों के प्रति मित्रतापूर्ण नीति रखते हुए भी हमें अपनी सुरक्षा पर अधिकाधिक सजग रहना होगा और सामर्थ्य को बढ़ाना होगा। इससे भी यह स्पष्ट हुआ कि कौन-कौन से देश वास्तव में हमारे मित्र हैं।
उन्होंने कहा कि देश के अंदर उग्रवादी नक्सली आंदोलन पर शासन और प्रशासन की दृढ़ कार्रवाई से नियंत्रण आया है। लेकिन इन क्षेत्रों में नक्सलवाद के पनपने का मूल कारण शोषण, न्याय और विकास का अभाव तथा प्रशासनिक असंवेदनशीलता रही है। इसलिए नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में न्याय, विकास, सद्भावना और सामंजस्य स्थापित करने के लिए व्यापक योजना बनानी होगी।
वैश्विक चुनौतियाँ
डॉ. भागवत ने कहा कि संचार माध्यमों और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार ने दुनिया के देशों में निकटता बढ़ा दी है। लेकिन विज्ञान एवं तकनीकी प्रगति की गति और मनुष्यों की अनुकूलन गति में बड़ा अंतर है। इसी कारण सामान्य मानव जीवन में अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। युद्धों, पर्यावरण के क्षरण से प्रकृति का प्रकोप, पारिवारिक टूटन, सामाजिक अव्यवस्था और नागरिक जीवन में बढ़ते अत्याचार जैसी चुनौतियाँ सामने आ रही हैं। इन समस्याओं से उबरने के प्रयास हुए हैं, लेकिन वे इनकी बढ़त रोकने या पूर्ण समाधान देने में सफल नहीं हो पाए हैं।




