पूर्वांचल के लगभग दस जिलों में धर्मांतरण का तरीका तेजी से बदल रहा है। अब मिशनरियों ने नई रणनीति अपनाई है — धर्म बदलने वालों के सरनेम या पहचान पत्रों में कोई बदलाव नहीं किया जा रहा। इसकी दो प्रमुख वजहें हैं।
पहली, यह कि धर्म परिवर्तन करने वाले लोग अब अपने ही समाज और गांवों में रहते हुए प्रचार-प्रसार का काम कर रहे हैं।
दूसरी, सरकारी दस्तावेजों में बदलाव न करने से सरकारी योजनाओं, आरक्षण और अन्य सुविधाओं का लाभ पहले की तरह मिलता रहता है।
आशा कार्यकर्ता भी कर रही हैं धर्मांतरण का प्रचार
जौनपुर जिले की एक आशा कार्यकर्ता (नाम सुरक्षित) खुद धर्म परिवर्तन कर चुकी हैं और अब दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित कर रही हैं। उनका कहना है — “मेरी पहचान वही है, बस एक लॉकेट पहनती हूं जो कपड़ों के अंदर रहता है।”
वह बताती हैं कि अब धर्म परिवर्तन के लिए नाम बदलने की जरूरत नहीं है। उनका कहना है, “नाम क्यों बदलें, चोरी तो नहीं कर रहे। मन से जो मानना है, मानो। सभा में नाम नहीं लिखा जाता, घर पर ही प्रार्थना करो।”
पुलिस की सख्ती से बदला ‘चंगाई सभा’ का तरीका
जौनपुर में पुलिस की बढ़ती सख्ती के बाद अब मोबाइल और ऑनलाइन माध्यम से प्रार्थना सभाएं कराई जा रही हैं। पहले ये सभाएं गांवों में घरों पर होती थीं, लेकिन अब लोग अपने घरों में व्यक्तिगत रूप से प्रार्थना करने लगे हैं।
मुंबई और दिल्ली से जुड़े पास्टर हर शुक्रवार और रविवार को ऑनलाइन सभा करते हैं, जिसमें नए लोगों को जोड़ा जाता है।जौनपुर के कई लोग अब वाराणसी के भुल्लनपुर में होने वाली बड़ी सभाओं में शामिल होते हैं। एक आशा कार्यकर्ता ने बताया कि “पिछली बार 10-11 लोग टेंपो से बनारस गए थे, वहां 250-300 लोग जुटे थे।”
स्थानीय परिवारों का कहना – अब सिर्फ यीशु को मानते हैं
अमर उजाला के रिपोर्ट के मुताबिक सुल्तानपुर जिले के अच्छेलाल नाम के व्यक्ति का परिवार बपतिस्मा (शपथ) ले चुका है। अच्छेलाल का कहना है कि अब वे केवल यीशु को ही मानते हैं। उनके परिवार के कुछ लोग अभी मूल धर्म में हैं, लेकिन वे घर पर ही यीशु के नाम की प्रार्थना करते हैं।
सरकी गांव के रमेश ने बताया कि चंगाई सभा में जाने से “फायदा” होता है और वे हर इतवार को सभा में शामिल होते हैं।
मिशनरियों का नया टारगेट – पहली पीढ़ी के लोग
पुलिस जांच में सामने आया है कि अब मिशनरियां गरीब, दलित या जनजातीय परिवारों के बच्चों को निशाना बना रही हैं। शादी, इलाज या शिक्षा के नाम पर आर्थिक मदद देकर पहले सहानुभूति हासिल की जाती है।
इसके बाद इन परिवारों को सभाओं और प्रार्थना कार्यक्रमों में शामिल किया जाता है।
सूत्रों के मुताबिक, एक व्यक्ति को धर्म परिवर्तन कराने का ‘रेट’ 25 से 50 हजार रुपये तक तय होता है।बिचौलियों को इसी के आधार पर कमीशन दिया जाता है।
धर्मांतरण का ‘खुला रेट’ और तरीका
उसी रिपोर्ट के अनुसार जौनपुर के खुज्झी गांव के वीरेंद्र विश्वकर्मा, जिन्होंने हाल ही में अपने मूल धर्म में वापसी की है, ने बताया कि शादी या इलाज के नाम पर प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराया जाता है।
उनके अनुसार, “एक व्यक्ति के धर्म परिवर्तन पर करीब 25 हजार रुपये मिलते हैं।”
फिलहाल खलिया, भुल्लनडीह और केराकत क्षेत्रों में हर गुरुवार को सुबह और शाम में ‘चंगाई सभा’ होती है।
इन सभाओं में आने वालों के नाम रजिस्टर में दर्ज किए जाते हैं और उन्हें यीशु के नाम का पानी पिलाया जाता है।
वीरेंद्र ने बताया कि पहले दुर्गा यादव नाम का व्यक्ति इन सभाओं का संचालन करता था, जिसका परिवार अब पूरी तरह धर्म परिवर्तन कर चुका है।
प्रशासन की सख्ती और कार्रवाई
जौनपुर के एसपी डॉ. कौस्तुभ ने बताया कि जहां भी लोभ या लालच के जरिए धर्म परिवर्तन की सूचना मिलती है, वहां तत्काल छापेमारी और कार्रवाई की जाती है।
उन्होंने कहा, “इस साल अब तक चार केस दर्ज किए जा चुके हैं और आरोपियों को जेल भेजा गया है। आगे भी सख्ती जारी रहेगी।”
पूर्वांचल में धर्म परिवर्तन का तरीका अब पहले जैसा नहीं रहा। अब यह शांत, छिपे और डिजिटल तरीके से किया जा रहा है, ताकि न तो कानूनी कार्रवाई हो और न सामाजिक विरोध।
सरनेम और दस्तावेज न बदलने से मिशनरियों को काम आसान लग रहा है, लेकिन प्रशासन के लिए यह नई चुनौती बन गया है।
धर्म के नाम पर आर्थिक और सामाजिक लालच का यह सिलसिला अगर समय रहते नहीं रुका, तो आने वाले समय में गांवों की सामाजिक संरचना पर बड़ा असर पड़ सकता है।




