लखनऊ की गलियों में, जहाँ सुबह की धूप और बच्चों की हँसी एक-दूसरे से गले मिलती है, वहाँ रहती है नन्ही श्रद्धा ठाकुर। 9 साल की यह मासूम, गुडुम्बा की संकरी सड़कों और टेंडर हार्ट स्कूल की किताबों के बीच अपनी दुनिया बसाती है।
मगर उसकी दुनिया में एक काँटा बार-बार चुभता था… वह जर्जर सड़क, जो स्कूल तक का रास्ता नहीं, बल्कि एक मुश्किल भूलभुलैया थी। बारिश में गड्ढों में पानी भर जाता, कीचड़ उछलता, और बच्चों के कदम डगमगाते। श्रद्धा का मन उदास हो जाता, मगर उसका दिल हिम्मत से भरा था। एक दिन, 26 जनवरी का सूरज उगा। गणतंत्र दिवस की धूम में लखनऊ सजा था। तिरंगे लहरा रहे थे, और शहर का दिल देशभक्ति की धुन पर थिरक रहा था। इसी दिन श्रद्धा ने ठान लिया कि वह अपनी बात उस शख्स तक पहुँचाएगी, जिसने अपने परिवार को त्यागकर तो संन्यास ले लिया लेकिन जनता को ही अपना परिवार मान लिया। नाम – योगी आदित्यनाथ।
पिता सत्येंद्र सिंह ठाकुर ने उसे रास्ता दिखाया -“बेटी, अपनी बात को कागज पर उतारो और सीधे योगी जी को दे दो।” श्रद्धा ने अपनी छोटी-सी डायरी में दिल की बात लिखी, और उस पत्र में एक बच्ची की सादगी और उम्मीद की चमक थी। जब वह सीएम योगी से मिली, उसकी आँखों में नन्हा सा सपना था, और हाथ में एक पत्र, जिसमें स्कूल की सड़क का दर्द बयाँ था। सीएम योगी, जिनके कंधों पर पूरे प्रदेश की जिम्मेदारी है, उस पल रुक गए। उन्होंने श्रद्धा की बात सुनी, उसकी मासूमियत पर मुस्कुराए, और उस पत्र को गंभीरता से पढ़ा। फिर, बिना देर किए, उन्होंने अधिकारियों को आदेश दिया – “यह सड़क बननी चाहिए, और जल्दी!”
यह कोई साधारण आदेश नहीं था; यह एक बच्ची के भरोसे को साकार करने का वचन था। समय ने करवट ली। 6 महीने बीते, और वह सड़क, जो कभी गड्ढों और कीचड़ का पर्याय थी, अब चमचमाती पक्की सड़क बन चुकी थी। श्रद्धा के कदम अब डगमगाते नहीं, बल्कि उछलते-कूदते स्कूल तक जाते। उसका चेहरा खुशी से दमक रहा था। मगर कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
श्रद्धा का दिल कह रहा था, “उस शख्स को धन्यवाद तो देना होगा, जिसने मेरी बात सुनी।” गुरुवार (14 अगस्त, 2025) का दिन था। लखनऊ का विधान भवन मानसून सत्र की गहमागहमी में डूबा था। योगी वहाँ मौजूद थे, अपने कर्तव्यों में तल्लीन। तभी उनकी नजर पड़ी नन्ही श्रद्धा पर, जो अपने पिता के साथ फिर से खड़ी थी, इस बार आभार के साथ। मुख्यमंत्री ने उसे पास बुलाया। उनकी आँखों में वही गर्मजोशी थी, जो एक पिता में अपने बच्चे के लिए होती है। उन्होंने श्रद्धा के सिर पर स्नेह भरा हाथ रखा, उसकी पढ़ाई के बारे में पूछा, और उसकी हिम्मत की तारीफ की।
“तुमने जो कहा, वह पूरा हुआ न?” हमेशा की तरह भगवा वस्त्र पहने सीएम योगी आदित्यनाथ ने मुस्कुराते हुए पूछा। श्रद्धा ने शर्माते हुए सिर हिलाया और कहा, “थैंक यू, योगी अंकल!”
यह मुलाकात सिर्फ एक बच्ची और मुख्यमंत्री की मुलाकात नहीं थी। यह उस संवेदनशीलता की मिसाल थी, जो योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व को परिभाषित करती है। वह शख्स, जो बड़े-बड़े फैसले लेता है, जिसके एक आदेश से शहर बदल जाते हैं, वह एक नन्ही बच्ची की आवाज को भी उतनी ही गंभीरता से सुनता है। यह कहानी सिर्फ सड़क बनने की नहीं, बल्कि विश्वास की जीत की है।
श्रद्धा ने अपनी मासूम आवाज में कहा, “मैं बहुत खुश हूँ। योगी जी ने मेरी बात सुनी और सड़क बनवा दी।” यह वाक्य सिर्फ एक बच्ची का आभार नहीं, बल्कि उस नेतृत्व का गवाह है, जो जनता के छोटे-छोटे दुखों को भी अपने दिल में जगह देता है। योगी जी ने न सिर्फ सड़क बनवाई, बल्कि एक बच्ची के मन में यह भरोसा भी जगाया कि उसकी आवाज मायने रखती है।
और हाँ, कहानी में एक और रंग तब जुड़ा, जब योगी जी ने श्रद्धा और उसके परिवार को स्वतंत्रता दिवस के समारोह में बुलाया। शायद वह चाहते थे कि यह नन्ही देशभक्त देखे कि कैसे एक मजबूत नेतृत्व देश और समाज को नई राह दिखाता है। लखनऊ की गलियों में अब सिर्फ सड़कें नहीं चमकतीं, बल्कि श्रद्धा जैसी बच्चियों के सपने भी चमकते हैं, क्योंकि वहाँ एक ऐसा नेता है, जो सुनता है, समझता है, और करता है। नन्ही श्रद्धा की यह कहानी, योगी जी के बड़े दिल की गवाही है – जहाँ हर आवाज, चाहे वह कितनी ही छोटी हो, सुनी जाती है, और हर सपना, चाहे वह कितना ही सादा हो, साकार होता है।




